मजहब, धर्म ,महा मारी

 आज सोचना पड़ेगा हमे की हम आज अपने मजहब के साथ अपने धर्म के साथ दूसरे धर्म का सम्मान कर सकते हे की नही।हर धर्म में कुछ ना कुछ अलग संदेश हे जो पूर्णता लाता है।

में आज चिंतन में आ गया की लोग अपने साथियों में धर्म जात पात देखने लगे।विशेषकर बुद्धिजीवी भी जो सिर्फ एक अदना सा इंसान है

इस महामारी में इलाज कराते वक्त कोई परहेज नहीं बच्चे किसी दूसरे धर्म के देशों में काम करे कोई परहेज नहीं।अगर किसी धर्म में एकता हे।किसी धर्म में सेवा के भाव हे,क्या हम उसकी बुराई करेगे या उस से सीखेंगे।अगर कोई अपने धर्म की राह पर आपके धर्म से अधिक तेज चल रहा हे आपको तकलीफ क्यू।अगर आप एक नही हो सकते तो जो एक रह रहे हे उस से परहेज क्यों।दोहरा जीवन दो मुखौटे।क्या हम दूसरे धर्म से नफरत इसलिए करने लगे की वोह धर्म हमसे नफरत करता है।हमने सीखा है अहिंसा परमोधर्म ।पर जब धर्म पर आए तो जान पर खेलो।पर किसी को बाध्य करना कहा तक उचित है






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